ईश्वर से विनती करता हूॅं

ईश्वर से विनती करता हूॅं

मुसीबतों का बड़ा पहाड़ 

था सर के ऊपर पड़ा हुआ 

हिम्मत न थी लड़ूॅ कैसे 

फिर मित्र भरोसे खड़ा हुआ।

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि 

कुछ मित्रों ने यह लोभ दिया 

मदद करेंगे हमसब मिलकर 

मुसीबतों को दूर भगाकर।

मित्रों के बल पर निकल पड़ा 

स्वयं माथे पर एक कफ़न बांध 

मन ही मन में स्वयं से खुश था 

मित्रों पर जो था विश्वास आंध। 

लेकिन जब जरूरत आन पड़ी 

सब पीठ दिखाने लगे मुझे 

जो ज्ञात बात थी पहले से 

वह शिक्षा देने लगे मुझे। 

उत्साहित हो पहुंचा पथ पर 

जिसपर थे कांटे बिछे हुए 

जो दिखा नहीं केवल भ्रम था 

एक ब्रह्म लकीर थी खींचे हुए।

मदद के बदले भीख मिली 

जिससे न कफन हो सकता था 

मुसीबतों से स्वयं लड़ने को 

फिर कैसे खड़ा हो सकता था। 

कहता हूं छोड़ो यह कहना 

हो मित्र सदा उपकारी भी 

न दूजा संग ऐसा करना 

न माफ करेंगे ईश्वर जी। 

मिलने तक का न समय मिला 

लगता था गले का हार मुझे 

हकीकत से जब पाला पड़ा 

अब लगने लगा पहाड़ मुझे।

लेकिन कुछ ऐसे भी निकले 

जिसने स्वयं तो मदद भी की 

कह दूजों को भी मदद करो 

अपनों जैसा ही अपील भी की।

न चुका कभी पाऊंगा मैं 

उनका यह ऋण सपनों में भी 

पर मुसीबतों को स्वयं अपना 

समझ समझ सहायता की।

कोटि कोटि प्रणाम उन्हें 

अपने दिल से मैं करता हूॅं 

न मुसीबत आए कभी उनपर 

ईश्वर से विनती करता हूॅं।


विजय सिंह नीलकण्ठ