बड़ों का महत्व

आजकल के बच्चे जब दो पैसे कमाने लगते हैं तो अपने से बड़ों या अभिभावकों के बातों को मानने के लिए तैयार नहीं होते और वह यही समझते हैं कि मैं जो कर रहा हूं वही ठीक है लेकिन जब कोई समस्या आ जाती है तब बड़े ही उसका समाधान करते हैं। इसी पर एक कहानी किसी ने बनाया है।

बहुत समय पहले किसी लड़के की शादी की बात पक्की हुई और लड़की वालों ने शर्त रखा कि 100 बारात में सभी लड़के और केवल लड़के ही आएंगे, कोई बड़े बुजुर्ग नहीं आएंगे। यदि ऐसा मान लिया जाता है तो शादी होगी अन्यथा नहीं होगी। इस बात पर लड़के वाले आपस में विचार विमर्श किए तो लगा कि इसमें कोई बात अवश्य है तो क्या किया जाए? इस पर एक बुजुर्ग ने सुझाव दिया कि किसी एक बड़े को तो जाना ही होगा नहीं तो कुछ भी हो सकता है। तब विचार किया गया कि किन्हीं बुजुर्ग को बक्से में छुपाकर ले जाया जाए और फिर ऐसा हीं हुआ। शादी संपन्न हुई और अगले दिन लड़की वाले 100 बकरे लेकर आए और बारातियों से कहा कि भाई आप सबको इन सभी बकरों को खाना है। यदि नहीं खा पाएंगे तो अच्छा नहीं होगा। आप लोगों की भरपूर पिटाई होगी। सभी लड़के परेशान कि अब क्या किया जाए कुछ बात समझ में नहीं आ रही थी। तभी एक लड़के ने बक्से के पास जाकर बुजुर्ग से कहा कि चाचा जी ऐसी-ऐसी समस्या आ गई है अब क्या किया जाए? चाचा जी ने जवाब दिया कि चिंता करने की कोई बात नहीं है। तुम लोग एक-एक बकरे को काटकर बनाकर खा लो अर्थात पहले एक बकरे को काटकर बनाकर खाओ फिर दूसरे को फिर तीसरे को। इसी तरह धीरे-धीरे सभी बकरे को खा जाओगे। लड़कों ने ऐसा हीं किया और धीरे-धीरे सभी बकरों को खा सका। जब यह बात लड़की वाले को पता चला तो उन्हें लगा कि बारात में अवश्य हीं कोई बड़े होंगे और इस बात की जांच शुरू की गई तो बुजुर्ग सामने आए जिससे लड़की वालों ने कहा कि आज के बच्चों की आंख पर पड़े घमंड के पर्दे को उतार फेंकने के लिए हीं ऐसा किया गया था।

इस छोटी सी कहानी से यह पता चलता है कि किसी भी समस्या का समाधान या कोई भी महत्वपूर्ण फैसला लेने से पहले आज के बच्चों को अपने से बड़ों और अभिभावकों के बातों को अवश्य मानना चाहिए नहीं तो समस्या से बाहर निकलना मुस्किल हीं नहीं नामुमकिन भी है।

विजय सिंह नीलकण्ठ

सदस्य टीओबी टीम